लाखों निर्दोष विचाराधीन कैदी जेल में – जिम्मेदार कौन?
डॉ. एंथोनी राजू, अधिवक्ता सर्वोच्च न्यायालय एवं चेयरमैन – अखिल भारतीय मानवाधिकार, स्वतंत्रता एवं सामाजिक न्याय परिषद
भारत अपने संविधान और न्याय व्यवस्था पर गर्व करता है, लेकिन एक कड़वी सच्चाई यह है कि आज भी देश की जेलों में दो-तिहाई से अधिक कैदी विचाराधीन (Undertrial) हैं, जिनमें से बड़ी संख्या निर्दोष है। वे वर्षों से न्याय की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
यह केवल एक कानूनी समस्या नहीं, बल्कि मानवाधिकारों का गंभीर हनन है और अनुच्छेद 21 के तहत गारंटीकृत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का सीधा उल्लंघन है।
जिम्मेदार कौन है?
1. पुलिस – अनावश्यक गिरफ्तारियाँ, कमजोर जाँच और समय पर चार्जशीट दाखिल न करना।
2. न्यायपालिका – जजों की कमी, तारीख़ पर तारीख़, जमानत सुनवाई में देरी।
3. अभियोजन (Prosecution) व राज्य – सबूत पेश करने में लापरवाही और जवाबदेही की कमी।
4. जेल प्रशासन – कैदियों को उनके अधिकारों और मुफ़्त विधिक सहायता के बारे में जानकारी न देना।
5. विधायिका (Legislature) – क़ानून में सुधार होने के बावजूद (जैसे धारा 436A दंप्रसं / धारा 479 BNSS 2023), इनका प्रभावी क्रियान्वयन न होना।
न्यायालय और मानवाधिकार का दृष्टिकोण
हुसैनआरा खातून बनाम बिहार राज्य (1979) – सुप्रीम कोर्ट ने त्वरित न्याय पाने का अधिकार अनुच्छेद 21 का हिस्सा माना।
अर्नेश कुमार बनाम बिहार राज्य (2014) – अनावश्यक गिरफ्तारी से बचने के स्पष्ट निर्देश दिए।
लेकिन हकीकत यह है कि निर्देश और फैसले काग़ज़ों में ही सीमित रह जाते हैं।
कठोर सच्चाई
ये विचाराधीन कैदी केवल आंकड़े नहीं हैं। ये हमारे मज़दूर, किसान, युवा और हाशिए पर खड़े नागरिक हैं जो गरीबी और अनभिज्ञता के कारण वकील तक नहीं कर पाते।
उनके लिए न्याय में देरी, न्याय से वंचित होना है।
आगे का रास्ता
“जेल नहीं, ज़मानत” सिद्धांत को लागू करना।
त्वरित न्यायालयों का गठन और केस मॉनिटरिंग व्यवस्था।
पुलिस और अभियोजन की जवाबदेही तय करना।
निःशुल्क विधिक सहायता की पहुँच हर कैदी तक सुनिश्चित करना।
अंतिम संदेश
जब लाखों निर्दोष नागरिक बिना दोष सिद्ध हुए जेलों में सड़ रहे हों, तो पूरा आपराधिक न्याय तंत्र दोषी है।
राज्य का यह संवैधानिक दायित्व है कि वह हर नागरिक की स्वतंत्रता और गरिमा की रक्षा करे।
यदि हम अब भी मौन रहे, तो यह केवल निर्दोषों की क़ैद नहीं होगी, बल्कि न्याय की आत्मा की क़ैद होगी।
✍️ जारीकर्ता:
डॉ. एंथोनी राजू
अधिवक्ता, सर्वोच्च न्यायालय
चेयरमैन – अखिल भारतीय मानवाधिकार, स्वतंत्रता एवं सामाजिक न्याय परिषद
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